Poems

Sunsets That Made Me Sway

Sunset brings with itself melting emotions of bygone days;

Golden days that make you sway to an unheard tune;

Tunes those were once the songs we hummed;

With our fingers intertwined only to watch it give way to night;

Those sunsets were different than the sunsets of today;

Sunset was an emotion then, it is just another evening today;

Each sunset was then captured in the eyes and saved in our souls;

Today I capture it with my camera to praise it as nature’s galore;

Sunset is an emotion, I remind myself again;

Lost in its beauty, I go down the memory lane.

रिश्ते, आज कल…

आज कल के रिश्ते भी अजीब होते हैं

दिखावा ज्यादा, भावनाएं कम

Whatsapp ज्यादा, फ़ोन काम

कहाँ है वह लगाव वह घंटो घंटों बातें करना

पुरानी बातें याद कर हसी ठिठोली करना

पहले जन्मदिन पर आधी रात को भाई बहन जागते थे

अब “सुबह ऑफिस है” कह कर निपटा देते हैं

फ़ोन करना तो एक formality सा हो गया है

कैसे हो , क्या हो , सब ठीक है

अच्छा ध्यान रखना में सीमित हो गया है

फ़ोन भी आपको वही करेगा, जिसे आप करोगे

चार बार किया तो वह एक बार करेगा

पहले दूर होकर भी पास होने का एहसास होता था

अब तो त्यौहार पर भी फॉरवर्ड्स आ जाते हैं

वो भी अगर आप खुश करने वालों की सूची में आते हैं तो

मैसेज टाइप करने में भी कष्ट है लोगों को

Okay को K और थैंक यू को tks लिख देते हैं

हाँ सज धज के फोटो जरूर भेजते हैं

भले बड़ों का आशीर्वाद और छोटों को प्यार न कहे

सिमट के रह गए हैं, टेक्नोलॉजी में खो गए हैं

ये मासूम से रिश्ते…

जो पहले मिलकर साथ चलते थे

आज स्वार्थी से दिखते हैं वे रिश्ते

खून के रिश्तों से ऊपर हैं आज यह दिखावे के रिश्ते

शब्दों के तोल मोल में फंसे

आज मोल भाव में धंसे हुए हैं यह रिश्ते

दो बच्चों में आज कुछ माँएं भी भेद-भाव करती हैं

कुछ माँ का प्रेम भी आंशिक सा हो गया है

जहाँ मिले सुख , उधर रहना पसंद करती हैं

बुरे समय में फ़ोन पर बस सांत्वना ही मिलती है

जो भावुक हैं, आज भी अपेक्षाएं रखते हैं

अपनेपन की वही चोट बार-बार मिलती है

ये दिखावों की दुनिया है मालिक

यहाँ रिश्ते प्यार से नहीं दिखावों पे जीते जाते हैं II

—–

अनुप्रिया मिश्रा

ज़िन्दगी तू कहाँ निकल गई

एक बचपन की तलाश में पता ही न चला कहाँ साढ़े तीन दशक निकल गए, 
कुछ अनकही सी बातें सुनने को, कुछ सपने बुनने को,
कुछ हठ करने को, जो मन्न विह्वल रहता था ,
न जाने ऐसे कितने वो पल निकलते चले गए ,
हम कल भी थे, हम आज भी हैं, वो वक़्त गुज़रते चले गए।

बचपन का वो लड़कपन आज भी याद आता है, 
मन मचलता था कुछ ख्वाहिशों को, पूरा होने पर इतराता था, 
अपनी सामर्थ्य से ज़्यादा माता पिता कर जाते थे,
और फिर भी मन्न हठी था, एक नयी ख्वाहिश ले आता था, 
वे तबभी हमारी खुशियों में अपनी खुशियों को ढूंढ़ते थे,
आज भी हममे ही उनकी सारी चिंताए सिमटी हैं,
सब कुछ बिलकुल वैसा ही है, वो वक्त गुज़रते चले गए।

जब छत्त पर क्रिकट खेलते थे और भैया बहुत खिजाते थे,
कभी मोटी, कभी झूटी कह फिर मिल कर ठहाके लगाते थे,
वो बारिश में कागज़ की नावें जब हम दौड़ाते थे,
और एक दूसरे की परेशानियों को मिलकर सुलझाते थे,
आज वो दिन मोती बनकर आँखों से बह जाते हैं,
क्योंकि यादें हैं वैसी ही बस वक्त गुज़रते चले जाते हैं।

बचपन की अधूरी ख्वाहिशों पर माँ यह कह कर समझाती थी,
ज़िन्दगी की अभी शुरुआत है, आगे खुशियां भरमार हैं ,
आज तीन दशक निकले हैं तो एहसास यही होता है,
वो दिन क्या दिन थे बचपन के जब लाड बहुत होता है, 
ख़ुशी वही थी जिसमे अपनों का हाँथ सदा होता है,
कम हो या ज़्यादा, फिर भी हममे प्यार बहुत होता है,
है आज सब कुछ फिर भी बस वो प्यारे वक़्त गुज़रते चले जाते हैं।

बचपन में बड़े होने की चाह बहुत होती है, 
पता चला बड़े होकर की यह राह बहुत कठिन है,
दूर करे जो अपनों से वो नौकरी है आज पाई,
घर चलाने की ज़िम्मेदारी में सुख, शांति, सेहत है गवाई,
फिर दिल बहलाने को वो वक़्त याद आते हैं,
जब बिना शिकन के छोटी से बड़ी ज़रुरत पापा पूरी करते हैं, 
हो स्थिति कितनी भी तंग, परेशानी ज़ाहिर न करते हैं,
आज भी वे करने को उतने ही आतुर हैं, फिर भी वो वक़्त कहाँ, जो वक़्त गुज़रते चले जाते हैं।

समय बड़ा बलवान है, नहीं रुकता यह किसी के लिए,
हम सोचते रह जातें हैं और पल हाथों से फिसल जाते हैं,
बचपन में खुशियां बेशुमार थी लेकिन हम भागना चाहते थे,
आज ज़िन्दगी भाग रही है, कहीं तो ठहराव आ जाये ये सोचते हैं, 
क्या थोड़ा समय बिता लूँ मै वापस बचपन की गलियों में,
मै हूँ वही, सब हैं वही क्या थोड़ा प्यार लुटा लूँ मैं,
इस समय को कैद कर लूँ , एक बार फिर हठ कर लूँ मै, 
क्योंकि वक़्त गुज़रते चले जाते हैं, फिर बहुत याद आते हैं।

~ Dedicated to my parents on my 35th birthday

Book Review: Railonama—Unforgettable train stories

Railonama_Book Review_Anupriya Mishra
Authors: Various
Publisher: Good Times Books Pvt. Ltd.
Price: INR 250
Pages: 236
My rating: 4/5

I have always loved traveling by train, observing people, sitting by the window side watching the splendid scenery and waiting to watch for a deep turn only to have a glimpse of the first bogie. I also love the pacey noise of the engine and whistle leaving trails of smoke. Despite such deep affection with various facets of the Indian Rails, I could never think of writing or even compiling something like Railonama. Railonama is a collection of short stories and poems encapsulating the train tales in India from people across the world.

To create something like Railonama is completely out of the box and three cheers for sharing such overwhelming, heartwarming experiences that we can easily relate to. It’s hard to believe that Anupama Sharma, a computer engineer by profession can come up with such an emotional and lively work; weaving stories of near and far into a fine tapestry that reflects the experiences of train travelers in India.

The more you flip through the pages of this book, the more you feel that this is something similar to what you have experienced once and still you would enjoy reading it because it’s presented beautifully and successfully creates an imagery that takes you back in time.

We come across strange, funny, sarcastic, annoying, friendly, wicked and all sorts of people during journeys. How they talk, how they behave? Some are too full of themselves while others would just pass a smile or a glance and be happy in their own company. There are people half hanging on the train doors, knowing that it can cost their life. Despite that why do they risk it? How can few kids waving hands on the other side of the track bring a smile to your face? These are some common things, uncommonly presented in this book.

You would read a few stories and be more and more interested to read further because all the writers who have contributed to this book, sharing their experiences have done their bit in making this book a pleasant read. The stories make you feel happy and you can read it on your heavy, tiresome days without churning your brains or getting bored. Most of the stories are well-presented, but some you may find to be plain and ordinary. There are total of 45 stories and poems written in simple English and so you can read them anytime and recommend it to any age group. The book binds in itself numerous emotions and gives an insight as to how differently people sense and observe the same things as we do. We might just miss going deep, while a few live in that moment. Things that we mostly tend to ignore are described in a fascinating manner in this book.

A must read for those who love traveling, sharing and of course those who wish to transcend the usual approach towards train traveling.

This review is a part of the biggest Book Review Program for Indian Bloggers. Participate now to get free books!

Take me away

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Take me to a place, I can be myself
I take a deep breath and enjoy the silence.

Take me to a different world, where liveliness dwells,
Oh! Let me forget my worries, to serenity seamless.

Hold my hand and take me away, from the life that’s demanding,
To a place where I sense love, and only love that’s deep within.

Come; take me before it’s too late for you and for me
Bring me some moments of warmth and tranquility.

Take me away from this life full of worries,
To a distant place, we build remarkable memories.

Steal me away from this world so obnoxious.
For the world that’s full of love enormous.

Yes, take me to a place I can be myself,
For once, just once let me live these reveries.

Image Courtesy: Pictures.4ever