Poems

What if I say…

Life is not always a throwback. You got to live in the present and plan for the future.

What if, I say I want to fly, would you give me that initial push I need;

Hold me close to only set me free.

What if, I want to touch the sky, would you show me the path I seek;

Hold my hand only to let me be.

What if, I tell you I want to deep dive into the meandering rivers;

Would you see me dive and swim away from you?

What if, I want to start all over again, would you ever understand;

And, leave me at a safe place.

What if, I want to reach the topmost peak and cry my heart out;

Would you still let me go without looking back?

What if, I want a life without the ifs, would you kiss away my worries;

And, let me fly without wings.

PS: The first part of this poem was written 9 years back https://anupriyamishra.wordpress.com/2013/08/09/fly-without-wings/

It’s a journey from then to now, a transformation, an evolution from a bunch of experiences that come calling

Sunsets That Made Me Sway

Sunset brings with itself melting emotions of bygone days;

Golden days that make you sway to an unheard tune;

Tunes those were once the songs we hummed;

With our fingers intertwined only to watch it give way to night;

Those sunsets were different than the sunsets of today;

Sunset was an emotion then, it is just another evening today;

Each sunset was then captured in the eyes and saved in our souls;

Today I capture it with my camera to praise it as nature’s galore;

Sunset is an emotion, I remind myself again;

Lost in its beauty, I go down the memory lane.

रिश्ते, आज कल…

आज कल के रिश्ते भी अजीब होते हैं

दिखावा ज्यादा, भावनाएं कम

Whatsapp ज्यादा, फ़ोन काम

कहाँ है वह लगाव वह घंटो घंटों बातें करना

पुरानी बातें याद कर हसी ठिठोली करना

पहले जन्मदिन पर आधी रात को भाई बहन जागते थे

अब “सुबह ऑफिस है” कह कर निपटा देते हैं

फ़ोन करना तो एक formality सा हो गया है

कैसे हो , क्या हो , सब ठीक है

अच्छा ध्यान रखना में सीमित हो गया है

फ़ोन भी आपको वही करेगा, जिसे आप करोगे

चार बार किया तो वह एक बार करेगा

पहले दूर होकर भी पास होने का एहसास होता था

अब तो त्यौहार पर भी फॉरवर्ड्स आ जाते हैं

वो भी अगर आप खुश करने वालों की सूची में आते हैं तो

मैसेज टाइप करने में भी कष्ट है लोगों को

Okay को K और थैंक यू को tks लिख देते हैं

हाँ सज धज के फोटो जरूर भेजते हैं

भले बड़ों का आशीर्वाद और छोटों को प्यार न कहे

सिमट के रह गए हैं, टेक्नोलॉजी में खो गए हैं

ये मासूम से रिश्ते…

जो पहले मिलकर साथ चलते थे

आज स्वार्थी से दिखते हैं वे रिश्ते

खून के रिश्तों से ऊपर हैं आज यह दिखावे के रिश्ते

शब्दों के तोल मोल में फंसे

आज मोल भाव में धंसे हुए हैं यह रिश्ते

दो बच्चों में आज कुछ माँएं भी भेद-भाव करती हैं

कुछ माँ का प्रेम भी आंशिक सा हो गया है

जहाँ मिले सुख , उधर रहना पसंद करती हैं

बुरे समय में फ़ोन पर बस सांत्वना ही मिलती है

जो भावुक हैं, आज भी अपेक्षाएं रखते हैं

अपनेपन की वही चोट बार-बार मिलती है

ये दिखावों की दुनिया है मालिक

यहाँ रिश्ते प्यार से नहीं दिखावों पे जीते जाते हैं II

—–

अनुप्रिया मिश्रा

शहर छोड़ दिया मैंने

दो वक़्त की रोटी को मैं निकला था गाँव से

अम्मा बिलख-बिलख रोई , बापू भी थे बौराये से  

क्यों जाते हो शहर को, इन खेतों को पीछे छोड़

अपना घर यह गांव है, बाकी सब है माया मोह

न आई बात समझ तब, चल दिए सीना चौड़ा कर

शहरों में पैसा है, गाँव में आखिर रखा क्या है

एक छोटा सा है खेत, खून पसीना बहे अपार  

आंधी तूफ़ान आये और कर दे सब बेकार

गर आंधी से बच जाए धान, कितना मै पाउँगा

कुछ आ भी जावे तो क्या ही बचाऊंगा

अरे घर कैसे चलाऊंगा जब है बड़ा परिवार

इसलिए अनसुनी करके, निकला था लाचार

किया मजूरी, धक्के खाए, सहे हर हालात

भीषण सर्दी गर्मी में न लौटा अपने गाँव

गांव जहा थक जाने पर माँ गर्म दूध पिलाती थी

नीम की ठंडी पुरवाई सारे गम भुलाती थी

कुछ पैसों के लिए बनाया अनजान शहर को अपना

आ पड़ी विपदा जिसका नाम था कोरोना

हालात फिर बदले बोला निकलो अपने घर

ये शहर नहीं था अपना, कोई न था हमदर्द

चल दिए पथिक हम वापिस अपना झोला लेकर

क्या होगा आगे इसकी किसी को न थी खबर

न जेब में पैसा, न ही खाने का कोई ठिकाना था

चल दिए हौसला लेकर, तिनके सा कोई सहारा न था

कितने मीलों दूर चलें, चप्पल ने भी साथ छोड़ दिया

दो सूखी रोटी खा के, गाओं की ओर रुख मोड़ लिया

फटी बिवाई, निकला खून, तार की उन सड़कों पर

जो शहर को जोड़े गाओं की उन कच्ची गलियों पर

वो लम्बा सफर तय कर, अधमरा सा घर पहुंचा हूँ

अब लगा यहाँ अपनापन, शहरों में बस धोखा है

सब भागे कमाने की खातिर, न मनुष्यता, न प्रेम है

जहाँ देखो वही बस इंसानों की होड़ है

नहीं चाहिए ज़्यादा पैसा, करनी नहीं मजूरी  

गाँव मेरा घर है, शहर जाना नहीं ज़रूरी

दो वक़्त की रोटी, यहीं रहकर कमाऊंगा

अब शहर नहीं जाऊंगा, अब शहर नहीं जाऊंगा

Wrote this a month back in the plight of migrants during COVID-19, posting it now. Hope you like it. To follow my daily updates and content follow me on Instagram @appy.tales.

ज़िन्दगी तू कहाँ निकल गई

एक बचपन की तलाश में पता ही न चला कहाँ साढ़े तीन दशक निकल गए, 
कुछ अनकही सी बातें सुनने को, कुछ सपने बुनने को,
कुछ हठ करने को, जो मन्न विह्वल रहता था ,
न जाने ऐसे कितने वो पल निकलते चले गए ,
हम कल भी थे, हम आज भी हैं, वो वक़्त गुज़रते चले गए।

बचपन का वो लड़कपन आज भी याद आता है, 
मन मचलता था कुछ ख्वाहिशों को, पूरा होने पर इतराता था, 
अपनी सामर्थ्य से ज़्यादा माता पिता कर जाते थे,
और फिर भी मन्न हठी था, एक नयी ख्वाहिश ले आता था, 
वे तबभी हमारी खुशियों में अपनी खुशियों को ढूंढ़ते थे,
आज भी हममे ही उनकी सारी चिंताए सिमटी हैं,
सब कुछ बिलकुल वैसा ही है, वो वक्त गुज़रते चले गए।

जब छत्त पर क्रिकट खेलते थे और भैया बहुत खिजाते थे,
कभी मोटी, कभी झूटी कह फिर मिल कर ठहाके लगाते थे,
वो बारिश में कागज़ की नावें जब हम दौड़ाते थे,
और एक दूसरे की परेशानियों को मिलकर सुलझाते थे,
आज वो दिन मोती बनकर आँखों से बह जाते हैं,
क्योंकि यादें हैं वैसी ही बस वक्त गुज़रते चले जाते हैं।

बचपन की अधूरी ख्वाहिशों पर माँ यह कह कर समझाती थी,
ज़िन्दगी की अभी शुरुआत है, आगे खुशियां भरमार हैं ,
आज तीन दशक निकले हैं तो एहसास यही होता है,
वो दिन क्या दिन थे बचपन के जब लाड बहुत होता है, 
ख़ुशी वही थी जिसमे अपनों का हाँथ सदा होता है,
कम हो या ज़्यादा, फिर भी हममे प्यार बहुत होता है,
है आज सब कुछ फिर भी बस वो प्यारे वक़्त गुज़रते चले जाते हैं।

बचपन में बड़े होने की चाह बहुत होती है, 
पता चला बड़े होकर की यह राह बहुत कठिन है,
दूर करे जो अपनों से वो नौकरी है आज पाई,
घर चलाने की ज़िम्मेदारी में सुख, शांति, सेहत है गवाई,
फिर दिल बहलाने को वो वक़्त याद आते हैं,
जब बिना शिकन के छोटी से बड़ी ज़रुरत पापा पूरी करते हैं, 
हो स्थिति कितनी भी तंग, परेशानी ज़ाहिर न करते हैं,
आज भी वे करने को उतने ही आतुर हैं, फिर भी वो वक़्त कहाँ, जो वक़्त गुज़रते चले जाते हैं।

समय बड़ा बलवान है, नहीं रुकता यह किसी के लिए,
हम सोचते रह जातें हैं और पल हाथों से फिसल जाते हैं,
बचपन में खुशियां बेशुमार थी लेकिन हम भागना चाहते थे,
आज ज़िन्दगी भाग रही है, कहीं तो ठहराव आ जाये ये सोचते हैं, 
क्या थोड़ा समय बिता लूँ मै वापस बचपन की गलियों में,
मै हूँ वही, सब हैं वही क्या थोड़ा प्यार लुटा लूँ मैं,
इस समय को कैद कर लूँ , एक बार फिर हठ कर लूँ मै, 
क्योंकि वक़्त गुज़रते चले जाते हैं, फिर बहुत याद आते हैं।

~ Dedicated to my parents on my 35th birthday